शनिवार, 7 अगस्त 2010

ReT NahiN hooN MaiN

reत   नहीं हूँ मैं
घुल जाने दो हवाओं में
आकाश में , जल में.
रेत नहीं हूँ मैं !
गुनगुनाउंगी लहराती फसलों में
जंगलों में बांसों के खोल से उभरूंगी  तान -सी
लपकती लपटों -सा लील लूंगी
सुलगते ख़यालों का धुंआ .
रेत नहीं हूँ मैं ! 

शनिवार, 1 मई 2010

vegvaan mousamon ko guzarane do

guzar jaane do 
 aandhion- se vegvaan mousamon ko
 prateeksha ik bal hai ,sankalp hai
  sujhaati hai,sikhaati hai koushal
  ran-kridaaon ke bahuvidh koushal
  shradha se preya grahan karane ka koushal bhi
  lapakati laharon ka loutana sahaj hai
  baandhegi dor kaise unhen
   laharon ko, mousamon ko guzar jaane do.

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

रोती हुई लड़की



रोती हुई लड़की को गौर से देखो
मासूम नहीं है यह रोती हुई लड़की
जाने किस -किस को रुलाएगी हज़ारों आंसू.

विवश-सी 
क्यों गले उतारे
विषघूँट-सा वासंतरण
निर्बाध बाला -सी
धीरे -से गुनगुनाएगी
कुछ और धार देगी
चितवन को , आंसुओं को , हठ  को


फिर देख कर संचित मधु को मुस्कराएगी

देगी धुआँ ,उड़ाएगी गौरवान्वित मधुमक्खिओँ को
 और  स्निग्ध हो चुटकी बजाएगी

मासूम नहीं है यह रोती हुई लड़की !







शनिवार, 28 नवंबर 2009

कितने पत्ते गिरा गया मौसम
जाने क्या -क्या हिला गया मौसम

बाँह  पसारे  खड़े रहे सपने
फिर मिलेंगे सुना गया मौसम

दर्द बोये गए बहुत गहरे
बिखरे बादल उड़ा गया मौसम

रविवार, 22 मार्च 2009

शिखरों की चढ़ान पर
विषम हवाओं को झेलते हुए
पुकारती हूँ तुम्हें
सुनती हूँ अपनी अनुगूंज
सहेजते हुए आशा किरण का उजास
डबडबाई आँखें लिए
थामते हुए अपने आँचल का छोर.

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

sabhyata aur aatank

...........अब सभ्यता क्या करे अपनी स्मृति का
दृष्टि का
उस दृष्टि में सुदूर मैदानों पर बिछी
अठ्खेलियाँ करती धूप है
पौधों को सहलाती हवा
और कोई टेर लिए झूमते पेड़ पत्ते हैं
वह दृष्टि दोहराती है अपना संकल्प
पर कैसे दर्ज करे वह
गुर्राते खूंखार कुत्तों
और उनके आतंक के खिलाफ
उस प्रेम की गुहार
जो जोड़ता है सबको इतने महीन सूत्रों से
कि दिखते नहीं वे सूत्र
लेकिन टूटने पर
अशांत,असुरक्षित
चमगादड़-से विकल
अपने-अपने खँडहर में हम
असहज,असहाय-से परिक्रमाबध छटपटाते हैं.
(complete poem published in भाषा , मार्च-अप्रैल 08 अंक )